लंबी लाइन में इंतज़ार

लंबी लाइन में इंतज़ार


अरे यार, आज मैं तुम्हें बताऊँगा वो दिन जब मैंने महसूस किया कि लंबी लाइन में खड़ा होना असली परीक्षा है—धैर्य और तमतमाहट की। सच कहूँ तो, अब भी याद करके बस हँसी और गुस्सा दोनों आता है।

तो कहानी कुछ यूँ शुरू होती है—पिछले साल मुझे अपने गृहनगर के सबसे बड़े बैंक में कुछ काम था। सोचा, सुबह जल्दी निकल जाऊँगा, नंबर जल्दी मिलेगा, और काम भी जल्दी निपट जाएगा। मैं सुबह 9:45 बजे वहाँ पहुँचा। बैंक का टाइम था 10 बजे से।

अंदर जाने के लिए लाइन देखी, तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। यार, लाइन इतनी लंबी थी कि मैं सोच रहा था, "इतना लंबा इंतज़ार… क्या सच में आज मेरा काम होगा?"

मैं जैसे ही लाइन में जुड़ा, मैंने देखा कि लोग सब शांत-सुथरे नहीं हैं। किसी की बच्चा चिल्ला रहा है, कोई बूढ़ा आदमी थक कर झुक गया है, और महिलाएँ झल्ला रही हैं। मुझे लगा, "अरे भाई, हम तो बस पाँच मिनट लेट आए हैं, बाकी सब यहाँ क्या कर रहे हैं?"

पहले दस-पंद्रह मिनट तो ठीक निकले। लेकिन जैसे ही आधा घंटा बीता, मुझे अंदर से घबराहट होने लगी। लाइन बिल्कुल धीरे-धीरे बढ़ रही थी। बैंक के अंदर केवल दो-तीन खिड़कियाँ खुली थीं।

फिर हुआ वो, जिसका इंतज़ार हर किसी को नहीं था—कंप्यूटर फेल। बैंक का सिस्टम डाउन हो गया। एक कर्मचारी बाहर आया और बोला,
"सभी लोग थोड़ा इंतज़ार करें, सिस्टम ठीक होते ही आपका नंबर बुलाया जाएगा।"

जैसे ही ये सुनाई दिया, लाइन में खड़े लोगों की नजरें घुस गईं। मैं भी सोच रहा था, "अब तो बस भगवान ही बचाए।"

पहले घंटे में तो लोग हंस-हंसकर बात कर रहे थे, पर जैसे-जैसे इंतज़ार बढ़ा, हंसी गायब होने लगी। लोग फोन में व्यस्त हो गए, बच्चे बोर होकर रोने लगे। हर कोई बस घड़ी और नंबर देखकर तमतमाहट में था।

तीसरे घंटे में मुझे पसीना आने लगा। भूख और प्यास दोनों सताने लगे। मुझे लग रहा था कि यह लाइन कभी खत्म नहीं होगी। कुछ लोग छोड़कर चले गए, कुछ जोर-जोर से शिकायत करने लगे।

और मैं? मैं खड़ा रहा, क्योंकि सोचा, "चलो, धैर्य रखो, काम जल्दी खत्म हो जाएगा।"

आख़िरकार मेरी बारी आई। अंदर गया, और देखा कि काम बस पाँच मिनट में निपट गया। हाँ, पाँच मिनट!
मैंने सोचा, "तो ये तीन घंटे की झकझोरती लाइन सिर्फ पाँच मिनट के काम के लिए थी!"

बैंक से बाहर निकलते हुए मैंने चारों तरफ़ थके हुए लोगों को देखा। सब बस यही सोच रहे थे कि अगली बार ऑनलाइन करना ही ठीक रहेगा।
और मैं? मैं भी सोच रहा था कि कभी भी बिना वजह इतनी लंबी लाइन में खड़े होना असली सबक है—धैर्य की परीक्षा।

आज भी जब मैं उस दिन को याद करता हूँ, तो थोड़ी हँसी आती है, थोड़ी गुस्सा भी। और यही लंबी लाइन में इंतज़ार की कहानी है—एक ऐसी चीज़ जो हर किसी के जीवन में कभी न कभी आती है, और आपको बिना गलती किए थका देती है।

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